गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

A Billion ideas : What an idea!!

सौ करोड़ विचारों में मेरे दो विचार

पिछले दिनों दिल्‍ली में एक अलहदा ब्‍लॉगर मीट हुई। अलहदा इस कोण से कि एक राजनीतिक पार्टी ब्‍लॉगरों के विचार जानना चाहती थी। कांग्रेस के ए बिलियन आइडियाज (A Billion ideas) के तहत करीब तीस हिंदी पट्टी के ब्‍लॉगरों को दिल्‍ली आमंत्रित किया गया था। खास बात यह रही कि आमंत्रण के साथ एक बात की तस्‍दीक कर दी गई थी कि दिए गए विषयों में आपको विचार तो करना है, लेकिन समस्‍या पैदा होने के कारणों के बजाय समस्‍या के समाधान पर अधिक ध्‍यान देना है। यह अलग बात है कि गोष्‍ठी के दौरान हिंदी में कुछ तंग हाथ वाले संचालक बार बार इसे निदान कह रहे थे। वे चाहते यही थे कि समाधान बताएं जाएं। 

गोष्‍ठी में कुल जमा चार विषय रखे गए थे। इसके बारे में पहले भेजी गई मेल में स्‍पष्‍ट कर दिया गया था। कि चार विषय कौन कौन से होंगे ? 

Broad themes for the event are
- How to retain the inclusiveness and secular fabric of the nation
- How to harness the potential of youth for innovation
- How to empower women to have a greater say in the household decision making
- How to increase transparency in the governance at all levels.

इनमें से मैं स्‍पष्‍ट रूप से केवल दो ही विषयों पर बता सकता था। सो उन्‍हीं दोनों विषयों पर मैंने ध्‍यान केन्द्रित किया। पहला था यूथ पावर। यूथ पावर पर मेरे विचार कुछ इस प्रकार थे... 

यूथ पावर
"देश के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्‍या रोजगार है। अगर युवाओं को अपने मन का काम मिल जाए तो युवाओं की शक्ति का सही उपयोग हो सकता है। अगर हमें ह्यूम सोर्स मैनेजमेंट को देखना है तो चीन की ओर देखना पड़ेगा। चीन ने एक बहुत शानदार काम किया। वर्तमान में भारत में मिल रहे टैबलेट, मोबाइल और लैपटॉप चीन से बनकर आ रहे हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ा एक्‍सपोर्टर है। इसका कारण यह नहीं है कि चीन की सरकार ने बड़ी फैक्ट्रियां लगाई या बड़े उद्योगपतियों की सहायता की। बजाय इसके चीन में प्‍लास्टिक और मोबाइल बनाने के सामान को सब्सिडाइज्‍ड किया गया और छोटे उद्यमियों को प्रोत्‍साहित किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि आज चीन में मोबाइल और इस प्रकार के दूसरे गैजेट्स की कॉटेज इंडस्‍ट्री बन गई। छोटे छोटे उद्यमियों को सरकार की इतनी सहायता प्राप्‍त है कि उन्‍हें अपना माल अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में बेचने के लिए किसी प्रकार की अतिरिक्‍त कसरत नहीं करनी पड़ती। वहीं हम अपने देश में देखें तो पता लगता है कि इस प्रकार की इंडस्‍ट्री लगाने के बजाय सरकारें मुफ्त लेपटॉप, टैब और मोबाइल बांट रही है। उत्‍तरप्रदेश और राजस्‍थान में ही राज्‍य सरकारों ने करीब सात लाख टैब का वितरण कर दिया। लेकिन किसी ने भी यहां टैब की उत्‍पादन इकाई स्‍थापित करने पर विचार नहीं किया। हमने चीन से टैब खरीदे और यहां के विद्यार्थियों को बांट दिए। इससे न तो हमें तकनीक के विकास का लाभ मिला न ही स्‍थानीय उद्यमी विकसित हुए। जैसा कि हम जानते हैं कि यह गैजेट्स जल्‍द ही पुराने पड़ने वाले हैं। यानी दो साल बाद इनकी कोई कीमत नहीं रहेगी। तो दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो हमने अपना दोहरा नुकसान किया। सात लाख टैब और मोबाइल के रूप में हम प्‍लास्टिक का कबाड़ खरीदकर एकत्रित करते जा रहे हैं। हमारी सरकार को नव उद्यमियों का सहयोग कर यहां पर भी ऐसी छोटी छोटी एसेंबली यूनिट्स बनानी चाहिए। ताकि स्‍थानीय उद्यमी विकसित हों, बेरोजारों को रोजगार मिले और तकनीक का विकास हो।"

सेक्‍युलर फाइबर
"इस मुद्दे पर मेरा विरोध और विचार एक ही बात है। दरअसल मेरा मानना है कि धर्म नितांत व्‍यक्तिगत विषयवस्‍तु है। सरकार अथवा राज्‍य का इसमें कोई दखल नहीं होना चाहिए। हम धर्मनिरपेक्ष राष्‍ट्र हैं। इसका क्‍या अर्थ लगाया जाए। क्‍या सभी धर्मों में राज्‍य और सरकार को टांग फच्‍चर करनी चाहिए या सभी धर्मों को सम्‍मान देते हुए उन्‍हें अपने स्‍तर पर निपटने देने के लिए छोड़ देना चाहिए। एक सरकार सेक्‍युलर हो सकती है जब वह सभी धर्मों का सम्‍मान करे। लेकिन इससे सरकार को धर्म के भीतर छेड़छाड़ करने या लाभ अथवा दंड से प्रभावित करने का अधिकार तब भी सरकार को नहीं मिलता है। ऐसे में किसी सरकार या शासन की जिम्‍मेदारी बनती है कि राज्‍य के किसी भी व्‍यक्ति को धर्म के आधार पर न तो दंडित किया जाए न ही लाभ दिया जाए। ऐसे में सरकार सेक्‍युलर बनी रह सकती है। यह तभी हो सकता है जब राज्‍य की शक्तियों से मिलने वाले हर प्रकार के लाभ और धर्म (या कहें संप्रदाय) को अलग कर दिया जाए। वर्तमान में सरकारें एक तरफ कानून बना रही हैं कि लाउडस्‍पीकर नहीं बजाया जा सकता तो दूसरी तरफ धर्म या संप्रदाय के आधार पर लाउडस्‍पीकर बजाने की छूट दी जा रही है। एक तरफ सरकार धार्मिक स्‍थल की यात्रा के लिए सब्सिडी और राहत पैकेज जारी कर रही है तो दूसरी ओर कर लगाया जा रहा है। ये दोनों ही स्थितियां एक सेक्‍युलर सरकार के लिए घातक हैं। इससे आम आस्‍थावान नागरिक सरकार को किसी समुदाय विशेष की ओर झुका हुआ मानने लगता है और उसका विश्‍वास राज्‍य पर से उठने लगता है।"


इन दोनों विचारों के अलावा और भी कई मुद्दों पर टेबल शेयर कर रहे साथियों के साथ चर्चा हुई। चर्चा के दौरान कई मुद्दों पर मेरी सहमति बनी तो कई पर मैं सहमत नहीं था। चर्चा के दौरान कई बार लगा कि अलगा व्‍यक्ति मेरे ही विचार बोल रहा है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि जो दूसरे ब्‍लॉगर्स ने बोला मेरे भी विचार वैसे ही थे, लेकिन कमोबेश ब्‍लॉगरों के दिमाग में आने वाले भविष्‍य की तस्‍वीर दिखाई दे रही थी। भले ही एक पार्टी ने अपने खर्च पर ब्‍लॉगर मीट कराई, लेकिन देश के अलग अलग कोनों में स्‍वांत सुखाय लेखन कर रहे ब्‍लॉगरों ने जब अपने विचार रखे तो एक सार्थक निष्‍कर्ष निकलता दिखाई दिया। इस सार्थक बहस और मीट के लिए मैं कांग्रेस के ए बिलियन आइडियाज प्रोजेक्‍ट को साधूवाद देता हूं। 

ब्‍लॉगर मीट के आयोजकों ने मुझे कहा है कि शीघ्र फोटो भेज दिए जाएंगे। जब फोटो मिलेंगे तो उन्‍हें भी यहां चस्‍पा कर दिया जाएगा... :) 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

बंधे हुए हथियार और आजाद हमलावर

एक दूसरे ग्रह का प्राणी विमान से छिटककर दूर जा गिरा और हमारे यहां बीकानेर में आ फंसा। आधी रात का समय था (अब उड़नतश्‍तरियां तो उसी समय घूमती है ना) एलियन भाई गिरते पड़ते किसी प्रकार दूर धोरे पर पहुंचना चाह रहे थे कि कुत्‍तों की नजर उन पर पड़ गई। एक ने भौंका और बाकियों ने सुर में सुर मिलाकर भौंक का भूकम्‍प ला दिया। कुछ हरावल दस्‍ते के कुत्‍ते को एलियन बाबू पर झपट भी पड़े।

एक बार तो वे कूद फांदकर बच गए। इतने में देखा कि एक आदमी जो दूर से निकल रहा था। (हमारे यहां ऐसे पराई पीड़ा को जानने वालों की भरमार है) उसने एक पत्‍थर उठाया और भद्दी गालियां निकालते हुए कुत्‍तों पर फेंका। कुत्‍ते दूर हट गए। आदम की परछाई हटी नहीं कि कुत्‍ते फिर मैदान में आ डटे। एलियन ने उस आदमी की दोनों गतिविधियों को गौर से देखा। गालियां जो उसने अपने एडवांस ब्रेन में रिकॉर्ड कर ली थी और एक्‍शन हथियार (पत्‍थर) उठाकर मारना। उसने गौर से जमीन की ओर देखा तो उसे बड़ी संख्‍या में हथियार फैले दिखाई दिए। वह बहुत खुश हुआ। 

रिकॉर्ड की हुई आवाज को ज्‍यों का त्‍यों उच्‍चारित करते हुए वह झुका और हथियार को उठाने के लिए जोर लगाया, लेकिन हथियार जमीन में जोर से गड़ा हुआ था। पहले प्रयास में निकला नहीं। उसने और जोर लगाया, लेकिन हथियार निकला नहीं। इस बीच मुंह से ठीक वही आवाज निकालता रहा। कुत्‍ते एक बारगी तो पीछे हट गए, लेकिन जब उन्‍होंने देखा कि इतना अधिक घामड़ आदमी है कि सही पत्‍थर का भी चुनाव नहीं कर पा रहा है और गड़े हुए पत्‍थर पर अपनी अधिक शक्ति जाया कर रहा है तो वे और जोर से भौंकने लगे। काटने वाला कुत्‍ता गश्‍ती पर था नहीं, वरना काट पीट भी शुरू हो सकती थी। 

काफी देर तक कुत्‍तों के भौंकने और एलियन के पत्‍थर निकालने के प्रयास जारी रहे। आखिर एलियन ने आखिरी हथियार अपनाया और छोटी स्टिक निकाली जो झाड़ू में बदल गई। उस पर बैठकर वहां से रवाना हो गया। इस बीच उसने कहा 

"यह ग्रह बहुत खतरनाक है। 
यहां हमलावर आजाद हैं 
और हथियार बांधकर रखे गए हैं।"

कहानी यहां आकर खत्‍म नहीं हो जाती। दरअसल हमारे बाजार की भी कमोबेश यही स्थिति है। मैंने सुना है राज्‍य की अवधारणा कृषि के बाद शुरू हुई। कृषि में इतना उगता था कि खा पी लेने के बाद भी अधिशेष रह जाता था। इस अधिशेष पर कब्‍जे की कोशिश के मद्देनजर ही कुछ लोगों ने सुरक्षा, व्‍यवस्‍था और न्‍याय के लिए राज्‍य का गठन किया गया। अब राज्‍य के मूलभूत कार्यों में यह शामिल है कि राज्‍य का हर व्‍यक्ति इन चीजों के प्रति सहज रहे। आखिर राज्‍य बनाया ही इसीलिए गया कि इन आधारभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति हो जाए, इसके बाद इंसान आगे बढ़ने का प्रयास करे। लेकिन हो इससे उल्‍टा ही रहा है। हर इंसान इन आधारभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए अपना पूरा जीवन व्‍यतीत कर रहा है। 

अब बात करते हैं सट्टे की। सट्टे की मनोवृत्ति को एक सटोरिए ने बहुत शानदार तरीके समझाया। सुपर बाउल खेल में से कुछ जुआरियों को पकड़कर पुलिस ले जा रही थी। कार्रवाई के दौरान ही बारिश शुरू हो गई। इसी बीच कार में बैठे एक जुआरी ने पुलिस वाले से पूछा कि क्‍या तुम बता सकते हो कि कार की दोनों खिड़कियों की सिरे पर जो बूंदें लटक रही हैं, उनमें से कौनसी बूंद पहले नीचे आ गिरेगी। पुलिसवाला सोचने लगा। इतने में जुआरी हंसा, उसने कहा तुम हमें रोक नहीं सकते। हम कभी भी, कहीं भी, कैसे भी सट्टा कर सकते हैं। 

यही सटोरिए एक दिन हमारे मुक्‍त बाजार के हिमायती सिस्‍टम में वहां घुस गए, जहां आम आदमी भी बुरी तरह प्रभावित होता है। अनाज में। देश के 95 प्रतिशत लोग अन्‍न पर निर्भर हैं। कुछ समुद्री किनारों वाले लोग भले ही मांस मच्‍छी नियमित खाने में खाते होंगे, लेकिन शेष लोग गेहूं, बाजरी, चावल, जौ, मक्‍का और दालों पर ही जिंदा हैं। इन लोगों को यह रोजाना न मिले तो व्‍यवस्‍था बिगड़ सकती है, लेकिन वर्ष इक्‍कीसवी सदी के पहले ही दशक में हमारे सामने बड़े सट्टा बाजार आ चुके थे। इन्‍हें नाम दिया गया कमोडिटी एक्‍सचेंज। एक है नेशनल कमोडिटी एस्‍कचेंज और दूसरा है मल्‍टी कमोडिटी एक्‍सचेंज। इनके अलावा भी कई हैं, लेकिन भारत में ये सबसे बड़े हैं। 

अपने शुरूआती दौर में इन एक्‍सचेंज में ग्‍वार और उड़द जैसी वस्‍तुओं पर अधिक सट्टा हो रहा था, लेकिन बाद में हर चीज को शामिल करते गए। आखिर एक दिन यह स्थिति आई कि किसान भले ही पहले की तरह भूखा मर रहा हो, लेकिन हैजर्स (यह कुलीन सटोरिए होते हैं), सटोरिए और जुआरी भावों को तय कर माल लूटने लगे। नतीजा यह हुआ कि आम उपभोक्‍ता तक पहुंच रही वस्‍तुएं इतनी महंगी हुई कि हाहाकर होने लगा। 

जब किसानों ने देखा कि उन्‍हें बीज मिल रहा है दोगुने दाम में और फसल बिक रही है आधे दाम में तो उन्‍होंने बगावत कर दी। बाजार की स्थिति सामने दिख रही थी। सरकार झुक गई। सरकारी नियंत्रण के तहत फसलों का मूल्‍य तय करने के लिए एक आधारभूत राशि तय करने का प्रयास किया जाता है। जिसे सरकार समर्थन मूल्‍य कहती है। यानी किसानों से कहा जाता है आप तो फसल उगाओ, अगर नहीं बिकी तो कम से कम इस कीमत में तो हम ले ही लेंगे। 

नतीजा यह हुआ कि हर साल समर्थन मूल्‍य में बढ़ोतरी होने लगी। इस तेज बढ़ोतरी के बाद हर बार सट्ट बाजार और अधिक सक्रिय होकर फसलों के दाम और बढ़ाने लगा। नतीजा यह हुआ कि अन्‍न और दूसरे खाद्य पदार्थ और महंगे हुए।

मुक्‍त और नियंत्रित बाजार में ऊपर बताई गई कुत्‍ते और पत्‍थर वाली समस्‍या ही है। यहां कुत्‍ते आजाद हैं और पत्‍थर बंधे हुए हैं। सरकारी नियंत्रण समर्थन मूल्‍य को बढ़ाने के इतर और कुछ कर नहीं पाता और बाजार सरकारी नियंत्रण की इस बेबसी का जमकर फायदा उठाता है। 

दूसरे देशों को देखें तो वहां या तो पूर्णतया सरकारी नियंत्रण है या पूर्णतया मुक्‍त बाजार है। भारत में दोनों व्‍यवस्‍थाएं होने से आखिर में केवल ट्रेडर और सटोरिया ही फायदे में नजर आ रहा है। या‍ फिर सरकार पर दबाव बनाकर समर्थन मूल्‍य बढ़वाकर अपना माल बेचने वाले बड़े किसान (जो आमतौर पर रसूखदार लोग होते हैं) ही फायदा उठा रहे हैं। 

अगर सरकार नियंत्रण रखती है तो उसे इस प्रकार का नियंत्रण रखना चाहिए कि किसान की जरूरत के मुताबिक उसे फसल का सही दाम मिल जाए और उपभोक्‍ता पर बिचौलियों की कसरतों का दबाव न आए। ऐसे में सरकारी नियंत्रण को सफल कह सकते हैं। वरना बिचौलिए अपना पेट भरते और बढ़ाते रहेंगे, किसान और उपभोक्‍ता अधिक पिसते और मरते रहेंगे। 

या फिर बाजार को ही मुक्‍त कर दिया जाए। जिसे जिस भाव में जो सामान जहां मिल रहा है, वहीं खरीदे। इस खुले बाजार में जो शेर होगा वही चरेगा, न सरकार की जरूरत न नियंत्रण का दबाव। बाजार खुद ब खुद नियंत्रित हो जाएगा। 

वरना पत्‍थर बंधे रहेंगे और कुत्‍ते भौंकते रहेंगे... 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

All we need is feudal system

हमें सामंती या कहें राजशाही तंत्र की ही जरूरत है

कहने को हम 15 अगस्‍त 1947 को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद हो गए, और आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक भाग हैं, लेकिन हकीकत में देखा जाए तो अभी लोकतंत्र आया ही नहीं है। लोकतंत्र के आने में अभी कुछ दशक और लग जाएंगे। तब तक हमें सामंतशाही की जरूरत है। यह बुरा लग सकता है कि आजादी का गला घोंटकर मैं राजशाही का पक्ष ले रहा हूं, लेकिन गौर कीजिए क्‍या हम छद्म सामंतवाद की छाया में नहीं खड़े हैं। राजशाही (feudalism) में जहां कम से कम एक राजा या सामंत होता है जिसे जिम्‍मेदार बनाया या बताया जा सकता और व्‍यवस्‍था के प्रति भी वही जवाबदेह होता है। वर्तमान भारत में सामंतवादी हरकतें अपने चरम पर हैं, लेकिन कोई राजा या सामंत जिम्‍मेदारी लेने के लिए नहीं है। किसी की कोई जिम्‍मेदारी नहीं और सत्‍ता पर काबिज कुछ लोग, कुछ घराने, धन और ताकत का राज।

क्‍या वास्‍तव में हम खुद को धोखे में नहीं रखे हुए हैं। एक नेताजी होते हैं, और उनके पीछे चेलों चपाटों की पूरी फौज। जो उनकी हां में हां मिला रही है। उन नेताजी को कोई बुरा कहने वाला नहीं। अगर कह भी दिया तो नेताजी की मोटी खाल पर कोई असर नहीं। पॉलिटिकल इम्‍युनिटी (Political immunity) लिए नेता, रावण की तरह हंसते हुए लूटते हैं। यह व्‍यवस्‍था कोई बाहर से नहीं आई है। 

संसाधन सीमित हैं 
उन्‍हें बढ़ाने का भी कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ। 
आजादी (Freedom) के साठ साल बाद शिक्षा का अधिकार दिया गया
स्‍वास्‍थ्‍य और सुरक्षा का अधिकार तो अब भी कोई जमीनी हकीकत नहीं रखते। 
पुलिस हमारी सेवा के लिए नहीं बल्कि हमें डंडा दिखाने और भय पैदा करने के लिए है। 
न्‍यायालय के बारे में मान लिया गया है कि न्‍याय में देरी होगी 
भले ही यह कहा जाए कि जस्टिस डिलेड जस्टिस डिनाइड

राजनीतिक पार्टियां (political parties) बाहरी ताकतों नहीं लादी हैं। इसी व्‍यवस्‍था में शिक्षा और संसाधनों से वंचित लोगों ने अपने अपने क्षेत्रों में उन लोगों का चुनाव किया जो उन क्षेत्रों के लोगों के "काम" आ सके। नतीजा यह हुआ कि काम आने वाला बंदा काम करके ऐसी हैसियत में पहुंच गया कि अपने क्षेत्र में वह शेर है और दूसरी गली में पहुंचते ही दुम दबाए कुत्‍ता। ऐसे में राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कोई एक जन नेता तैयार होने की कोई सूरत बाकी नहीं रही। 

अब यही क्षेत्रीय लोग मिलकर एक ऐसे नेता का चुनाव करते हैं जो उनके निजी या उनके क्षेत्र के हित साध सके। क्षेत्रीय नेताओं के पास दोहरी चुनौतियां हैं। पहली कि अपने क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखा जाए, तो दूसरी ओर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपना प्रभाव अधिक से अधिक बढ़ाए। नेता बदल गया तो क्षेत्र का प्रतिनिधित्‍व भी खत्‍म हो जाता है। ऐसे में क्षेत्र विशेष की जनता की मजबूरी बन जाती है कि अपने हित साधने के लिए भ्रष्‍टाचार में डूब चुकने के बाद भी उसी नेता का चुनाव कराए जो पहले से राष्‍ट्रीय या राज्‍य स्‍तर पर कुछ रसूख रखता हो। 

इन घटनाओं के साथ राष्‍ट्रीय स्‍तर पर शुरू में एक पार्टी रहती है तो बाद में दूसरी पार्टी लहर के साथ आती है। चूंकि एक पार्टी स्‍वतंत्रता दिलाने के खम भरते हुए पहले से सत्‍ता में है सो उसका विघटन भी धीरे धीरे होता है, जैसे जैसे देश के लोग आजादी की डायलेमा से बाहर निकलते हैं, वैसे वैसे दूसरी पार्टी को बल मिलता है। आखिर एक लहर आती है और वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन जाती है। 

वही क्षेत्रीय लोग और उसी राज्‍य और राष्‍ट्र स्‍तरीय कमशकश से सामना होता है और दोनों पार्टियों में एक जैसे लोग नजर आने लगते हैं। चूंकि चुनाव खर्चीला है और क्षेत्रीय दबदबा जरूरी चीज है। ऐसे में हर स्‍तर पर भ्रष्‍ट लोगों और भ्रष्‍टाचार का सहारा लिया जाता है। आखिर में दोनों पार्टियां जॉर्ज ओरवेल के सुअरों जैसी दिखाई देने लगती है।

फिलहाल देश की राष्‍ट्रीय राजनीति में ऐसे दो लोग दिखाई दे रहे हैं जो अपने दम पर सत्‍ता और व्‍यवस्‍था में परिवर्तन का दावा करते हैं। एक हैं गुजरात के मुख्‍यमंत्री भाजपा के नरेन्‍द्र मोदी (Narendra modi) तो दूसरे हैं दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री आप के अरविन्‍द केजरीवाल (Arvind kejriwal)। दोनों ने अपने अपने तरीके से भारत की जनता में यह छवि बनाने का प्रयास किया है कि चाहे सिस्‍टम जैसा भी हो, वे अपने दम पर व्‍यवस्‍था में आमूलचूल परिवर्तन ला सकते हैं। 

न तो गुजरात भ्रष्‍टाचार से अछूता रहा है न दिल्‍ली का मुख्‍यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल इसे मुक्‍त करा पाए हैं। बस दोनों के पास छवि ही है। इस छवि में ऐसी क्‍या खास बात है। देखते हैं। 

दोनों अपने दम पर व्‍यवस्‍था परिवर्तन का दावा करते हैं 
दोनों खुद को दबंग साबित करते हैं 
दोनों अपने पार्टी पर अपने तरीके की पकड़ रखते हैं 
दोनों के पास सोशल मीडिया और मेन स्‍ट्रीम मीडिया पर प्रभाव डालने की शक्ति है
दोनों सत्‍ता पर काबिज पार्टी को हड़काते हैं 
दोनों के पास पर्याप्‍त धनबल दिखाई देता है 
दोनों के पास जनबल दिखाई देता है 
दोनों के पास अंध भक्‍तों की लंबी कतार है 

एक प्रकार से दोनों जनता की किसी आवाज के बजाय अपनी आवाज अधिक ताकत के साथ जनता तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। क्‍या एक सामंत यही काम नहीं करता। अगर कोई यह समझने की भूल करे कि वामपंथ में सामंतवाद से लड़ने की शक्ति है तो उन्‍हें पहले बने यूएसएसआर को देखना चाहिए, जहां हमेशा यह शिकायत रही कि सभी संसाधनों को मास्‍को में सीमित कर दिया गया है। दूसरी ओर सामंतवाद का सबसे शक्तिशाली उदाहरण खुद चीन है। अगर वहां लोकतंत्र हो तो राजशाही अंदाज में पोलित ब्‍यूरो की बैठक नहीं होती। हां, कुछ मामलों में यह राजतंत्र से अलग है, लेकिन अंतत: सत्‍ता और शक्ति को केन्द्रित करने का ही काम करती है। चाहे वह कुछ लोगों के पास हो, एक समूह विशेष के पास हो या एक पूरी संस्‍था के पास हो। 

भारत (India) में ऐसा पोलित ब्‍यूरो से चलने वाला देश बनाया जाना संभव नहीं है, क्‍योंकि इसके लिए संप्रदायों को दांव पर लगाना पड़ेगा। जो व्‍यवहारिक रूप से संभव नहीं है। ऐसे में वामपंथी सामंतवाद को अभी छोड़ दें। 

दूसरी ओर लोकतांत्रिक (democracy) सामंतवाद का नतीजा हम 65 सालों से भुगत ही रहे हैं। ऐसे में इस छद्म सामंतवाद को भी विदा करने का वक्‍त आ गया दिखाई देता है। 

तीसरे मिलट्री के हाथ में सत्‍ता देने का औचित्‍य दिखाई नहीं देता है। क्‍योंकि देश का भूभाग इतना विस्‍तृत और बेढ़ब है कि मिलट्री द्वारा इसे शासित किया जाना व्‍यवहारिक रूप से संभव नहीं है। वरना अब तक मिलट्री शासन भी आ सकता था, जैसा पाकिस्‍तान में आता रहा है। 

चौथा सिस्‍टम वही है असली सामंतवाद। कहने, सुनने और पढ़ने में भले ही बुरा लगे, लेकिन नए जमाने के इस दो राजाओं की टक्‍कर और उसके बाद के हालात देखने का अलग की कौतुहल होगा। दोनों में से कोई भी आए, अगर ये लोग अपने इस सामंतवादी चोले को छोड़ दें तो अलग बात है, वरना देश में बड़े परिवर्तनों की बयार शुरू हो सकती है। पिछले दस साल से देश ऐसे लुंज पुंज माहौल में आगे बढ़ रहा है, कि विश्‍व में आई मंदी के दौरान अपनी बचत के जोर से अपने पैरों पर खड़ा देश भी उसका लाभ नहीं उठाया पाया। हमारे लोगों को दुनिया के हर कोने में धमकाया, हड़काया और दबाया जा रहा है। 

नए नेतृत्‍व के बाद कम से कम यह सुकून रहेगा कि पीछे एक बड़ी ताकत खड़ी है जो किसी भी देश और ताकत को धमकाकर हमें उचित सम्‍मान दिला सकती है।